ध्यान योग



ध्यान के द्वारा आप बाहर की दुनिया से कट जाते हैं और स्वयं से जुड़ जाते हैं । बाहर की दुनिया से आप जुड़े हुए रहते हैं इन्द्रियों के द्वारा । 80% आपका आंख आपको बाहर से जोड़े हुए रहता है । आप जो भी देखते हैं , सुनते हैं , स्वाद लेते हैं , बोलते हैं , गन्ध लेते हैं , स्पर्श करते हैं उसी के द्वारा आपका मन गतिशील होता है । मन का गतिशील होना जीवन के लिए आवश्यक है किंतु अति गतिशील होना दुःख का कारण । अध्यात्म के मार्ग पर ध्यान आदि विधियों के द्वारा मन साथ छोड़ देता है और अत्यंत आनन्द की अनुभूति होने लगती है । कई ऋद्धियाँ सिद्धियां भी प्रकट होती है किंतु साधक उन सिद्धियों से विचलित नहीं होता है क्योंकि मन नहीं होता है । सिद्धियां प्रकट हीं होती हैं साधक को विचलित करने के लिए । ध्यान के अनेक अनेक गुण स्वयं प्रकट होते हैं । वाणी में मधुरता , व्यवहार में मधुरता , हृदय में अत्यंत प्रेम उतपन्न होना साधक के बात सत्य होना आदि आदि । लम्बे ध्यान प्रयोग से आज्ञा चक्र के ठीक पीछे एक बिंदु नामक स्थान है वहां से अमृत क्षरण होने लगता है जिससे साधक का शरीर स्वस्थ एवं दीर्घायु होता है । हालांकि यह ध्यान और यौगिक क्रिया दोनों का मिश्रित फल होता है ।
ध्यान करने का सबसे ज्यादा लाभ मानसिक अवसाद से पीड़ित व्यक्ति में देखने को मिलता है । नियमित ध्यान करने से मानसिक अवसाद शांत हो जाता है ।
कई ऐसी ध्यान विधियां है जिसके द्वारा व्यक्ति स्वयं को संजीवनी दे सकता है तथा अन्य को संजीवनी दे कर स्वस्थ कर सकता है ।
ध्यान के लाभ हीं लाभ है और सब तो छोड़िए ध्यान से व्यक्ति परमात्मा का साक्षात्कार कर सकता है ।
इसलिए ध्यान करते रहें ।

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